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मारने वाले से बचाने वाला बडा होता है बचाने वाले से पालने वाला और जो लाए, बचाए, पाले उसकी बडाई का कहना ही क्या। सन 1976 में रीवा से सफेद बाघ का नाता टूट गया था अंतिम बाघ विराट के न रहने पर पूरा विन्ध्य केवल सफेद बाघ की कहानी गायक बन कर रह गया। राजेन्द्र शुक्ल की तब उम्र केवल 12 वर्ष की थी ऐसा बालमन जो कौतूहलो से भरा रहता है जो खेलना चाहता है, घूमना चाहता है, प्रकृति को आष्चर्य भरी निगाहों से निहारता है और फिर सवाल उठाता है बारिस क्यो होती है? इसका पानी कहां जाता है? बीज से पेड़ कैसे बनते है? जंगल क्यो है? जीव जन्तु क्यो जरूरी है? इन्द्रधनुष कैसे बनता है? पेड़ हरे क्यो हैं? इन सब सवालो के जबाव स्कूलो में मिलने की उम्र भी यह है। इस अवस्था में प्रकृति प्रेमी इस बच्चे ने यह जाना की हमारा क्षेत्र जो सफेद बाघ के गौरव से परिपूर्ण था अब वह विहीन हो चुका है। हम अब कभी सफेद बाघ इस क्षेत्र में नही देख पायेगें सफेद बाघ कैसा होता है अब यह केवल चित्रों के माध्यम से दूसरो को बता पायेंगे या फिर अन्य जगहांे पर जा कर देख पायेगें जहां पर यहीं के सफेद बाघ भेज दिए गए हैं।
समय बीतता गया सफेद बाघ मोहन और उसके वंष की कहानी गायी जाती रही, पर्यटक बांधवगढ़ आते रहे पीले बाघ और अन्य जीव जन्तु देखते रहे गोविन्दगढ़ आते और सफेद बाघ मोहन की स्मृतियों को सहेजते। यह क्रम बरसों चलता रहा पर एक समय ऐसा भी आया कि खराब सड़को की वजह से ये क्रम भी टूट गया। एक तो पहले से ही यह क्षेत्र प्रकृति की अद्भुत अनुपम कृति सफेद बाघ विहीन हो चुका था ऊपर से खराब सड़को और अव्वस्थाओं के कारण यह पर्यटन भी लगभग शून्य हो गया।
जब अपने अपने क्षेत्र की विषिष्टता की बात होती तो इस क्षेत्र से सबसे पहले यह कहा जाता कि विष्व में जो भी सफेद बाघ हैं वह सब रीवा के सफेद बाघ मोहन के वंषज हंै लेकिन यह कहने के साथ ही कहने वाले का चेहरा मायूसी और अपमान के भाव से भर जाता कि जिस गौरव की हम बात करते नही थक रहे है वह अब हमारे रीवा में ही नही है।
बालैमन के बाद युवा राजेन्द्र भी अन्य युवाओं की तरह इस पीडा से एक होते थे। इंजीनिरिंग स्नातक होते होते क्षेेत्र के विकास का संकल्प आप में दृड़ होता गया और आप के मन में यह बात बैठ गई की मुझे अपने विन्ध्य के गौरव के लिए काम करना है।
आप विन्ध्य के अति प्रतिष्ठित सेतुषिल्पी, संविदाकार, समाजसेवी स्व0 श्री भैयालाल शुक्ल जी के सुपुत्र हैं आप के पिता और परिवार का नाम पूरे क्षेत्र में अति सम्मान के साथ लिया जाता है। कर्मयोगी पिता कि संतान होने के साथ आपने अपने पिता के व्यवसायिक तथा समाज सेवा के कार्यो में हाथ बटाने के साथ राजनीति को भी समाज सेवा का माध्यम चुना आप ने यह जान लिया था कि राजनीति कि ताकत जो जनसमूह की ताकत है उसी के माध्यम से विन्ध्य की गौरव पताका को लहराया जा सकता है। छात्र राजनीति के बाद आप को रीवा की जनता ने अपना विधायक चुना और आप वन मंत्री बने, अपने विभाग की पहली ही बैठक में आप ने अधिकारियों के सम्मुख अपनी मंषा प्रकट कर दी कि मुझे रीवा में सफेद बाघ मोहन के वंषजो को पुनः लाना है और इस कार्य के लिए व्हाइट टाइगर सफारी का निर्माण करना है। वन विभाग के अधिकारियों ने यह कल्पना भी नही की थी कि कोई वन मंत्री पहली ही बैठक में इतना बठा काम हाथ में ले लेगा। अधिकारियों ने समझाया की साहब यह इतना आसान नही है तो आपने कहा की आसान होता तो मै कहता ही क्यो? लेकिन इसे आसान बनाना है और उस दिन से सब मिषन मोड़ में इस कार्य में लगाये आप इसके इंजन बने अैार सब सहयोगी डिब्बे और सब को सही दिषा में आपने दौड़ाना प्रारंभ कर दिया।
3 जनवरी 2012 को वह दिन भी आ गया जब व्हाइट टाइगर सफारी मुकुन्दपुर का भूमि पूजन संपन्न हो गया घोर बाघाओं को पार कर यह सुनहरा दिन आया था चाहे 14 तरह की अनापत्तियां लेने की बात हो या माननीय उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत सब आवष्यक कार्यवाहियां शनैः शनैः पूर्ण होती गई और काम प्रारंभ हुआ रूकावटे आती रही और उन रूकावटों को आपने अवसर के रूप में बदल कर आज मुकुन्दपुर व्हाइट टाइगर सफारी को इस गौरवमयी स्थिति में पहुंचा दिया जहां से वह विन्ध्य की जनता के लिए समर्पित होने लायक बन गई।
सफेद बाघ मोहन के वंषज अपनी जन्मभूमि मे वापस आ चुके है। मुकुन्दपुर मांद के नैसर्गिक वन क्षेत्र में निर्मित यह व्हाइट टाइगर सफारी विष्व की एक मात्र व्हाइट टाइगर सफारी है जहां जू भी है, रेस्क्यू और ब्रीडिंग सेन्टर भी है। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता और बचाने वाले से बड़ा होता है पालने वाला कभी लोगो ने अपने शौक के लिए इन प्रकृति के अनुपम उपहारों की हत्या की थी आर्थिक लाभ के लिए बचाया और बेचा था लेकिन कभी यह न सोचा कि यह हमारा गौरव है जिसे हम यूं ही गवाये दे रहे है। लेकिन देर से सही दुरूस्त रूप में राजेन्द्र शुक्ल ने उस गलती को ठीक किया हैं।
1951 में पहले सफेद बाघ मोहन तथा 1976 तक रहे अंतिम बाघ विराट के बाद राजेन्द्र शुक्ल जी के नेतृत्व में 40 वर्षो बाद वह शुभ दिन आया जब 9 नबम्बर 2015 को राजकुमारी ”विन्ध्या” बाघिन के रूप में पुनः मोहन के वंष ने मुकुन्दपुर व्हाइट टाइगर सफारी में आकर अपनी जन्मभूमि का वन्दन किया। विन्ध्य के लिए 9 नवम्बर 2015 वह ऐतिहासिक पल है जब विन्ध्य के लाल राजेन्द्र शुक्ल के नेतृत्व में सफेद बाघ के वंष ने पुनः विन्ध्य के मान सम्मान को जीवित किया।
आज 3 अप्रैल 2016 को उसी मुकुन्दपुर व्हाइट टाइगर सफारी का लोकार्पण माननीय मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान तथा केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्री प्रकाष जावडेकर तथा अन्य जन प्रतिनिधियों, अधिकारियों तथा हजारो हजार जनता की उपस्थिति में होने जा रहा है। इस पूरे भावनात्मक तथा गौरवमयी कार्य में मुख्यमंत्री जी का सहयोग अविस्मरणीय रहा है राजेन्द्र शुक्ल जी के प्रयास को अगर किसी ने पंख लगाये हैं तो वह हैं माननीय मुख्यमंत्री श्री षिवराज सिंह चैहान जी ।
विन्ध्य के लोग आज जहां अपने लाल राजेन्द्र शुक्ल को आषिर्वाद से सिंचित कर रहंे हैं वहीं मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान के प्रति धन्यवाद भी ज्ञापित कर रहे हंै कि उन्होंने विन्ध्य के गौरव सफेद बाघ को अपनी जन्मभूमि तक पहुचनें में अपनी भूमिका का निर्वहन गौरवषाली तरीके से किया हैं। इस गौरवमयी कार्य में सहयोग देने वाले सभी जनप्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी, बुद्धिजीवी, जनता जनार्दन धन्यवाद की अधिकारी है।
हम सब विन्ध्य वासियों के लिए यह गौरव का पल है उस किस्से कहानी के खत्म होने का दिन है जिसमें गाया जाता था कि सफेद बाघ हमारे यहां पाया गया फिर विष्व में सब जगह यही से गया।
अब हम गर्व और खुषी से कहेंगे कि सफेद बाघ हमारे यहां पाया गया, पूरे विष्व में यहीं से गया और देखो… देखो उसके वंषज अपनी जन्मभूमि में अठखेलियां करते दहाड़ रहे हैं।