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स्व. राजकपूर की स्मृतियों को चिरस्थाई बनायेगा कृष्णा-राजकपूर ऑडिटोरियम – ताहिर अली

सफेद बाघों की धरती रीवा में चार वर्ष पूर्व विन्ध्य महोत्सव का छोटा सा आयोजन इतना विशाल रूप ले लेगा कभी सोचा ही नही गया था। विन्ध्य की लोक कलाओं एवं प्रतिभाओं को मंच देकर उन्हें निखारने के साथ ही सैकड़ों साल पुरानी धरोहरों को पर्यटन के क्षेत्र में जोड़ने के उद्देश्य से विन्ध्य महोत्सव की शुरुआत की गई थी। उद्योग मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने विन्ध्य की इन धरोहरों को संरक्षित करने के उद्देश्य से विन्ध्य महोत्सव की शुरुआत की थी, जिसे अब पंख लग चुके है। दरअसल रीवा के नक्शे को लांघता हुआ यह आयोजन प्रदेश के बाद अब देश के नक्शे तक पहुँच गया है।
विन्ध्य महोत्सव ने जाने-माने फ़िल्म अभिनेता स्व. राजकपूर की रीवा से जुड़ी यादों को पुनर्जीवित कर दिया। चौतरफा विकास का एक सकारात्मक विजन लेकर चलने वाले मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल के जूनुन और जज्बें के साथ उनकी यादों को चिरस्थाई बनाये रखने के लिए एक भव्य कृष्णा-राजकपूर ऑडिटोरियम की कल्पना को साकार किया। इस सपने के साकार स्वरूप को आगामी 2 जून को स्व. कपूर के परिजनों और फ़िल्म जगत की नामचीन हस्तियों की मौजूदगी में जनता के लिए समर्पित किया जा रहा है। यह ऑडिटोरियम अब विलुप्त होती जा रही स्थानीय लोक कलाओं को न सिर्फ प्राणवायु प्रदान कर पुनर्जीवित करेगा बल्कि उन्हें निखारते हुए उचित मंच भी प्रदान करेगा।
एक हजार सीट के इस ऑडिटोरियम का निर्माण 3301 वर्ग मीटर क्षेत्रफल क्षेत्र में किया गया है। यह वातानुकूलित ऑडिटोरियम 18 करोड़ रूपये की लागत से बनाया गया है। इसमें थियेटर, रिसोर्ट, रेस्टोरेंट और दो लॉन तथा बाउण्ड्रीवाल का निर्माण किया गया है। पार्किंग के लिये भी पर्याप्त जगह रखी गई है।
विन्ध्य क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। सरदार जोगिन्दर सिंह से लेकर कई प्रतिभाओं ने कला और गायन के क्षेत्र में अपना स्थान बना लिया है। स्व. राजकपूर जी की शादी की साक्षी रीवा के अलावा फिल्म बिंदिया और बंदूक की शूटिंग रीवा में भी हुई थी। इसके बाद कई धारावाहिक और टेली फिल्में यहाँ बनाई गई। फ़िल्म अशोका में प्रयुक्त तोप और तलवारे रीवा राजघराने से ली गई थी। पर्यटन की दिशा में विन्ध्य बहुत समृद्ध है। मशहूर चचाई प्रपात, क्योटी प्रपात, बहुती प्रपात, बसामन मामा, टाइगर सफारी जैसे कई ऐसे स्थान को अब ज्यादा आकर्षक बनाया गया है, जहाँ बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया जा सकता है।
कृष्णा-राजकपूर ऑडिटोरियम का भूमि-पूजन अभिनेता रणधीर कपूर ने किया था। राजकपूर के पारिवारिक मित्र जयप्रकाश चौकसे इसे खासतौर पर देखने आए थे। प्रसिद्ध सिने कलाकार और पेशे से आर्किटेक्ट राजीव वर्मा ने पिछले साल जब इस निर्माणाधीन ऑडिटोरियम को देखा तो यह कहने से नहीं चूके कि यह एक विश्व-स्तरीय कला एवं रंगमंच होगा। कम से कम मध्यप्रदेश में तो ऐसा कोई प्रेक्षागार नहीं है।
कुछ मित्रों को यह खटकता है कि यह राजकपूर के नाम से क्यों? शादी बारात के बाद उनका क्या योगदान? योगदान तो लता मंगेशकर का भी इंदौर के लिए कुछ नहीं और न ही किशोर कुमार का खंडवा के लिए है, पर इंदौर और खंडवा के लोग इन दो महान शख्सियतों को पलभर के लिए भी बिसराना नहीं चाहते। राजकपूर का तो समूचा करियर ही रीवा की स्मृति की बुनियाद पर खड़ा हुआ है। यकीन न हो तो उनके द्वारा अभिनीत फिल्म “आह“ देखिए। रीवा को लेकर उनकी क्या कशिश है, समझ जाएंगे। रीवा का कृष्णा-राजकपूर ऑडिटोरियम कलाजगत के लिए विन्ध्य का सांस्कृतिक गान है।
अटूट रिश्ते की कहानी-
राजकपूर यानी की भारतीय फिल्म इतिहास का वह महान व्यक्तित्व जिन्होनें अपनी फिल्मों के माध्यम से भारत की प्रतिष्ठा को वैश्विक क्षितिज में स्थापित किया। जिनके फिल्मों के गीत गुनगुनाने वाले रूस, जापान में हैं तो अमेरिका और अफ्रीका में भी। ऐसे व्यक्तित्व का विन्ध्य की संस्कारधानी रीवा के साथ प्रगाढ़ रिश्ता होना समूचे मध्यप्रदेश के लिए गौरव का विषय है। हाँ श्री कपूर रीवा के पाहुन (दामाद) हैं। उनकी बारात यहीं पहुंची, परिणय हआ सौभाग्यकांक्षिणी कृष्णा के साथ। बात 1946 की है। वस्तुत: रीवा राज्य के पुलिस महानिरीक्षक थे श्री करतार नाथ मल्होत्रा। कृष्णाजी उन्हीं की सुपुत्री हैं। वे रीवा में पली-बढ़ी और पढ़ी। श्री राजकपूर के साथ दाम्पत्य सूत्र में जुड़ने के बाद वे बॉलीवुड की सर्वाधिक सम्मानीय महिला बनीं, जिनकी तीसरी पीढ़ी आज भी फिल्म जगत में कपूर खानदान के यश की ध्वजा फहराए हुए है।
श्री राजकपूर का रीवा से पहला वास्ता वर्ष 1944-45 में पड़ा जब उनके पिता श्री पृथ्वी राज कपूर अपना थियेटर लेकर यहाँ पधारें। किशोरवय राजकपूर को रीवा की गलियाँ, सड़कें और आबो-हवा इतनी भाइ कि वे इसी शहर के पाहुन बन गए। कारण सरदार करतार नाथ सिंह और पृथ्वीराज कपूर तथा राजकपूर और प्रेमनाथ की मित्रता। सुविख्यात फिल्म अभिनेता प्रेमनाथ कृष्णाजी के अग्रज थे। दिसंबर 1946 में जब कृष्णा-राजकपूर का परिणय संबंध हुआ तब कृष्णाजी 16 तथा राजकपूर 20 वर्ष के थे। श्री राजकपूर का रीवा के साथ इतना गहरा भावनात्मक संबंध रहा कि उन्होनें न सिर्फ अपनी एक पुत्री का नाम रीमा (रीवा का मूल नाम रीमा ही है) रखा अपितु अपनी ‘‘फिल्म’’ ‘‘आह’’ में रीवा को केन्द्रीय विषय में रखा। तांगे का वह चर्चित और अमर दृश्य जिसमें राजकपूर का पात्र तांगेवाला बने मुकेश (सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक) से कहता है मुझे रीवा जाना है…..।
राजकपूर की स्मृतियों को सहेजने की यह अनूंठी पहल उद्योग मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने की। श्री शुक्ल ने विन्ध्य की जनता की ओर से मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान से आग्रह किया और राजकपूर स्मृति सांस्कृतिक केन्द्र तथा प्रेक्षागृह ने अपना आकार लेना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने 13 सितंबर 2014 को राजकपूर स्मृति सांस्कृतिक केन्द्र तथा प्रेक्षागृह का भूमि-पूजन किया गया था। शीघ्र ही यह अभिनव केन्द्र कला जगत में नयी पहचान के साथ बनकर उभरने को तैयार है….. हाँ एक विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि सांस्कृतिक केन्द्र उसी परिसर में बनकर तैयार हो रहा है, जिस परिसर में स्थित पुलिस बंगले में श्री राजकपूर की बारात आयी और परिणय हुआ।
ग्रेटेस्ट शो मैन-राजकपूर-
राजकपूर का जन्म 14 दिसंबर 1924 को पेशावर “पाकिस्तान” के दक्की मुनव्वरशाह में हुआ था। पृथ्वीराज कपूर की छह संतानों में वे सबसे बड़े थे। उनके दोनों भाई शम्मी तथा राशि कपूर फिल्म जगत के नामचीन अभिनेता रहें। राजकपूर के दादा विशेषरनाथ कपूर दीवान थे। बंटवारे के बाद परिवार भारत आ गया। राजकपूर की प्रारंभिक शिक्षा कर्नल ब्राडन स्कूल देहरादून तथा सेंट जोवियर स्कूल में हुई। वर्ष 1935 में दस वर्ष की उम्र में ‘इंकलाब’ फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर अभिनय किया। 24 वर्ष (1948) की उम्र में उन्होंने आर.के. स्टेडियो की स्थापना की। इसके बाद एक के बाद एक फिल्मों ने इतिहास गढ़ा। उन्होंने जग प्रसिद्ध कलाकार चार्ली चैप्लिन की अभिनय शैली को बालीवुड में स्थापित किया। राजकपूर ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्हें दुनिया के अन्य देशों में भी अपार लोकप्रियता मिली। सोवियत रूस में उनके दीवानों की बड़ी संख्या थी। उन्हें 1986 में प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जीवन के उत्तरार्द्ध में वे दमे से पीड़ित थे और यही उनकी मृत्यु का कारण बना। सन 2 जून 1988 में फिल्मी दुनिया का महान कलाकार पार्थिव देह छोड़कर अमूर्त दुनिया में चला गया।

(ताहिर अली)
पूर्व संयुक्त संचालक जनसंपर्क

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