समाचार

कवि सूर्यभान कुशवाहा


करिया नागिन जइसन सड़कै,चामै दउरै पाँव रे 
चला लौटिके चली चुपारे अपने अपने गाँव रे 
मोटर गाड़ी केर चोगाडा करै कनपटी झाझर 
चकाचौंध बिजुरी के लाइट,पोछे आंखी काजर 
रात दिना ड़ीजे मुह फारे ,मुड़े ठैयां बाजय 
गिललियान जिउ अइसन लागै, गिरी मूड माँ गाजै 
बिल्लियान सब मनइ बागे मतलब के है ठाव रे 
चला लौटिके …………………………………..I 
साँस लेब तक दुर्घट होइगा ,चिमनी  धुआ उडावै 
बजबजात गंधैली नाली दिन भर नेकुवा दावै 
पन्छियाय जिउ लगै ओकाई परै न कहों रहाई  
पलई खूब धौकनी धौकय ,दम उखरै हरजाई 
कहुवा पीपर नीम बोलावे ,अमराई के छाव रे 
चला लौटिके ………………………………..I 
पइसा ओढ़ दसामै पइसा, शहर बना पइसा के खेल 
रात दिन पइसय के खीतिर ,दौड़य भागय हुर्रा पेल 
कम्पुटर मा आँखी काढ़े रात दिना सब जागय 
मोबाइल मा रहै मेलाने पईसै  खितिर भागय 
हितुआरस के अइसी तइसी,पइसय  के सब दाव रे 
चला लौटिके चली ………………………………….
कबरी पीलिया भूरी गैया बरदा धौरा कजरा 
छोटकीबा के मोह बुलावै जूडा बाँधे गजरा 
अम्मा के चुल्हवा के रोटी ,थपकी दै गोहरावै 
सपने माही बैइठ मुडउसे मुड़े मा सहरावै 
कौरा छोड़ शहर मा दौड़ेन लपकौरी के चाव रे 
चला लौटिके ……………………………………..i
सुधि आवै गमइन के अपने गादा भौरी होरा 
घर घर चलइ कलेवा कोह्डी सेतुवा भरे कटोरा 
इहा मिलै सडहे आलुन के भजिया गरम समोसा 
भिन भिनात माछी भन्नाती इडली साभर डोसा 
देखि लिहेन हम शहर लघे से ,होइगा पूर उराव रे 
चला लौटिके चली ………………………………..i

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आलेख – अजय नारायण त्रिपाठी

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अविस्मरणीय गौरवमयी पल व्हाइट टाइगर सफारी लोकार्पण

मारने वाले से बचाने वाला बडा होता है बचाने वाले से पालने वाला और जो लाए, बचाए, पाले उसकी बडाई का कहना ही क्या। सन 1976 में रीवा से सफेद बाघ का नाता टूट गया था अंतिम बाघ विराट के न रहने पर पूरा विन्ध्य केवल सफेद बाघ की कहानी गायक बन कर रह गया। राजेन्द्र शुक्ल की तब उम्र केवल 12 वर्ष की थी ऐसा बालमन जो कौतूहलो से भरा रहता है जो खेलना चाहता है, घूमना चाहता है, प्रकृति को आष्चर्य भरी निगाहों से निहारता है और फिर सवाल उठाता है बारिस क्यो होती है? इसका पानी कहां जाता है? बीज से पेड़ कैसे बनते है? जंगल क्यो है? जीव जन्तु क्यो जरूरी है? इन्द्रधनुष कैसे बनता है? पेड़ हरे क्यो हैं? इन सब सवालो के जबाव स्कूलो में मिलने की उम्र भी यह है। इस अवस्था में प्रकृति प्रेमी इस बच्चे ने यह जाना की हमारा क्षेत्र जो सफेद बाघ के गौरव से परिपूर्ण था अब वह विहीन हो चुका है। हम अब कभी सफेद बाघ इस क्षेत्र में नही देख पायेगें सफेद बाघ कैसा होता है अब यह केवल चित्रों के माध्यम से दूसरो को बता पायेंगे या फिर अन्य जगहांे पर जा कर देख पायेगें जहां पर यहीं के सफेद बाघ भेज दिए गए हैं। .. आगे पढ़ें


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