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क्षिप्रा पानी को साफ रखने के लिये नदी के किनारे लग रहे हैं ओजोन गैस प्लांट


Simhastha-Lobo

उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा नदी के पानी को साफ रखने के लिये 5 स्थान पर ओजोन गैस प्लांट लगाये जा रहे हैं। बुधवार को स्वच्छ क्षिप्रा अभियान उप समिति ने मोक्षदायिनी के विभिन्न घाट का दौरा कर की गयी व्यवस्थाओं को देखा। समिति ने क्षिप्रा नदी के तटीय क्षेत्र में बसे ग्राम राधोपिपल्या के समीप खान डायवर्सन के पाइंट का भी दौरा किया। उप समिति के अध्यक्ष श्री मुकेश टंटवाल ने बताया कि यह प्लांट 9 करोड़ की लागत से लगाया गया है।

सिंहस्थ के दौरान ओजोन गैस प्लांट लगने से क्षिप्रा नदी का पानी साफ रहेगा। ओजोन गैस प्लांट पूरब लॉजिस्टिक गुड़गाँव द्वारा लगाया गया है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन को ओजोन में परिवर्तित कर पानी में मिलाया जाता है। इस ओजोन मिश्रित पानी में किसी भी प्रकार के कीटाणु, रसायन और जैव अशुद्धियाँ नहीं टिक पाती हैं। यह 5 ओजोनेशन प्लांट रामघाट, गऊघाट, लालपुर, मंगलनाथ और नरसिंह घाट पर लगाये जा रहे हैं। पाँच संयंत्र में प्रतिदिन 100 ऑक्सीजन सिलेण्डर प्रयोग में लाये जायेंगे। सिंहस्थ की सम्पूर्ण अवधि में पाँच संयंत्र 24 घंटे कार्य करेंगे। इस प्रक्रिया से सिंहस्थ में पहुँचने वाले श्रद्धालुओं को स्नान के दौरान शुद्ध पानी मिल सकेगा। देश में पहली बार इस विधि से नदी में बहते हुए पानी को साफ किया जा रहा है।

कान्ह नदी का इंटेक पाइंट तैयार

कान्ह (खान) नदी डायवर्सन परियोजना में इंटेक पाइंट का कार्य पूरा कर लिया गया है। कान्ह नदी डायवर्सन के लिये लालपुर स्थित रेलवे लाइन के 60 फीट नीचे से पाइप लाइन का कार्य किया जा रहा है। रेलवे लाइन के नीचे से एक पाइप निकालने का कार्य पूरा हो चुका है। रेलवे लाइन के नीचे से दूसरे पाइप को निकालने का काम तेजी से किया जा रहा है। जल-संसाधन विभाग द्वारा लालपुर के नजदीक रेलवे लाइन के दूसरी ओर बने सम्पवेल में कान्ह नदी का पानी पहुँचाने के लिये 275 मीटर की लिफ्ट पाइप लाइन का कार्य तेजी से किया जा रहा है। पाइप लाइन के लिये 1000 हार्स-पॉवर के 12 मोटर-पम्प द्वारा रेलवे लाइन के दूसरी ओर नदी का पानी जरूरत पड़ने पर पहुँचाया जायेगा। कान्ह नदी परियोजना 19 किलोमीटर भूमिगत होकर कालियादेह पैलेस में निकाली जायेगी। पाइप लाइन में एक घंटे में 19 हजार लीटर पानी की क्षमता से कालियादेह पैलेस से आगे पानी छोड़ा जायेगा।

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आलेख – अजय नारायण त्रिपाठी

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