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माँ, मानव, महानिर्वाण के अतृप्त अन्वेषी राज कपूर


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उद्योग मंत्री राजेन्द्र शुक्ल तथा अभिनेता रणधीर कपूर राजकपूर स्मृति आँडिटोरियम के प्रस्तावित निर्माणाधीन भवन के नक्शे को देखते हुए

माँ, मानव, महानिर्वाण के अतृप्त अन्वेषी राज कपूर
अजय नारायण त्रिपाठी
14 दिसम्बर 1924 को जन्में भारतीय सिनेमा जगत के ’’द ग्रेट शो मैन’’ के नाम से जाने जाने वाले महान अभिनेता राजकपूर का आज जन्म दिन है। पूरी दुनिया को अपने अभिनय से हंसाने, रूलाने, सोचने, समझने, के लिए मजबूर करने वाले स्वर्गीय राजकपूर का रीवा से बड़ा गहरा नाता है। उनको याद करने का यह नाता भी विशेष बन जाता है। राजकपूर जी का विवाह कृष्णा मल्होत्रा जी से 12 मई 1946 को हुआ जो रीवा के तत्कालीन आई.जी. पुलिस करतार नाथ मल्होत्रा की बेटी थीं। अभी तक जहां रीवा का एस.पी. बंगला था वही पुराना रीवा आई जी का बंगला हुआ करता था अब इसी बंगले की जगह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान और रीवा विधायक तथा उद्योग मंत्री राजेन्द्र शुक्ल के प्रयास से स्वर्गीय राजकपूर तथा कृष्णा कपूर जी के सम्मान में एक भव्य आडीटोरियम निर्माणाधीन है जिसका नामकरण ’’ राजकूपर स्मृति आडीटोरियम एण्ड कल्चरल सेंटर’’ के रूप में किया गया है लगभग 20 करोड़ रूपये से ज्यादा की लागत का बन रहा यह आडीटोरियम विश्वस्तरीय तथा भव्य स्वरूप का रहेगा। इस आडीटोरियम के निर्माण का उद्देश्य विन्धय की ऐतिहासिक धरोहरों को राष्ट्रीय स्तर पहचान दिलाने, सहेजने, संवारने, कला संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने में कारगर सहयोग देने की है कपूर परिवार ने हमेशा विन्ध्य की सराहना की है यहां की सुन्दरता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है शम्मी कपूर जी ने यहां तक कहा है कि आज जो भी मैं हूं उसमें रीवा के उन सुनहरे दिनों का योगदान विशेष है जब मैं युवा हो रहा था तब मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाने का श्रेय रीवा को ही है। यहां की नैसर्गिक सुन्दरता का बखान करते हुए वह कभी नहीं थके। अपना एक पूरा साक्षात्कार ही उन्होने रीवा में अपने बिताये दिनों पर दिया। कृष्णा कपूर जी की शिक्षा दीक्षा यही रीवा के एस.के. स्कूल से हुई यह सर्वविदित है कि राजकूपर जी की सृजनशीलता का आधार स्तम्भ श्रीमती कृष्णा कपूर जी हैं और आपके इस गुण में रीवा का योगदान अतुलनीय है इसलिए आप हमेशा ही रीवा के प्रति अत्यधिक स्नेह से भरी रहती हैं आप हमेशा रीवा के बारे में जानने सुनने के लिए उत्सुक रहती हैं। राजकूपर जी ने लगभग अपने जीवन की ही कहानी को अपनी एक फिल्म ’’आह’’ के रूप में प्रदर्शित किया है जिसमें उन्होने रीवा का बार-बार जिक्र किया है। पिछले दिनों इस आडीटोरियम निर्माण कार्य का विधिवत भूमि पूजन ’’ द ग्रेट शो मैन’’ राजकपूर जी के बड़े बेटे अभिनेता रणधीर कपूर जी के हांथों सम्पन्न हुआ था। वह 14 दिसम्बर का ही दिन था, यह बड़े ही सौभाग्य का विषय है कि कृष्णा राजकपूर के स्मृति में बनने वाले इस आडीटोरियम का भूमि पूजन कपूर परिवार के सदस्य के हांथों सम्पन्न हुआ और इस कार्य में राजेन्द्र शुक्ल जी का विशेष प्रयास था। आपने सोचा कि भूमि पूजन तथा इसका लोकार्पण दोनों ही कपूर परिवार के हांथों हो जिससे इस परिवार का लगाव इस भूमि से और ज्यादा बढ़े। भूमि पूजन तो हो गया अब लोकार्पण की बात है लगातार काम चल रहा है अगर सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो ईश्वर की कृपा से पूरे कपूर परिवार के साथ कृष्णा कपूर जी के हांथों इसके लोकार्पण की चाह है। कृष्णा जी का रीवा से लगाव उस समय लगातार प्रदर्शित हो रहा था जब रणधीर कपूर जी यहां आये थे और मुंबई से कृष्णा जी लगातार रणधीर जी को फोन लगाकर उनसे यहां के बारे में जानकारी ले रही थीं। उन्होने रीवा में तथा बंगले में बिताई स्मृतियों को उनसे साझा किया और उन्हें बंगले की पीछे पीपल का पेड़ देखने को और बंगले के परिसर से यादगार के रूप में मिट्टी लाने के लिए निर्देशित किया था। मां के निर्देश एवं मार्गदर्शन के अनुरूप रणधीर जी ने बंगले का एक-एक कोना देखा वह अभिभूत थे क्योंकि उनकी मां उनके पिता जी, और चाचा जी हमेशा यहां की अच्छी-अच्छी बातें उनसे किया करते थे। आज वह उसी जगह को स्वयं अपनी आंखों से देख रहे थे और उस जगह में खड़े होकर उस सुखानुभूति को महसूस कर रहे थे। रणधीर कपूर जी ने यहां की स्मृतियां और यादगार के रूप में परिसर की मिट्टी अपने साथ ले गए तस्वीरों में कैद कर एक-एक स्मृति ले गए हैं साथ ही निर्माणाधीन इस आडीटोरियम के लोकार्पण के समय पूरे परिवार के साथ आने का वादा भी किया है। मेरा भी सौभाग्य रहा कि मैं उस पूरे अद्भुत स्मृतियों को सहेजने के कार्यक्रम में एक साक्षी के रूप में मौजूद रहा मैं रणधीर कपूर जी के साथ बनारस से रीवा तथा रीवा से बनारस के आने-जाने के पूरे समय उनके साथ रहा और उनसे कपूर परिवार के रीवा के प्रति सुन्दर विचार और स्मृतियों को जानने का सौभाग्य प्राप्त किया। उस समय सम्पन्न हुए इस कार्यक्रम के सभी आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं जिनकी मेहनत से रणधीर कपूर जी रीवा आये और उन्होने अपने माता पिता के उस सुखद स्मृतियों को सहेजने का अवसर प्राप्त किया जो उनके लिए चिरस्थायी तो हैं ही हम रीवा वासियों के लिए भी चिरस्थायी बन गया है। रणधीर कपूर जी ने उस दिन रीवा विधायक मंत्री राजेन्द्र शुक्ल जी के पिता महान समाज सेवी श्री भैयालाल शुक्ल जी को उनके निवास जाकर विशेष रूप से श्रद्धांजली अर्पित की थी साथ ही राजकपूर जी की स्मृति में बन रहे आडीटोरियम की विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त की थी आज पुनः राजकपूर जी के जन्म स्मृति का समय है और यह स्मृति का क्रम तो रीवा में अब लगातार ही बना रहेगा और इस आडीटोरियम के बन जाने के बाद इस स्मृति में भी भव्यता आयेगी अब बात करते हैं राजकपूर जी की सृजनशीलता की मैं राजकपूर के सृजन के पहले पायदान में ’’माँ ’’ को रखता हूं वह स्वयं भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके जीवन में मां सबसे महत्वपूर्ण किरदार हैं राजकपूर जी का पूरा फिल्मी सृजन अगर कहा जाय तो मां, मानव, और महानिर्वाण की कहानी है। उनकी फिल्मों में पूरे समय कहीं न कहीं मां रहती है और इसी लिहाज से ’’मातृत्व सृजन उभार अंग’’ का फिल्मांकन उन्होने लगभग सभी फिल्मों में किया है। क्योंकि किसी भी जीव विशेष कर स्तनपायी जीवों के नवजात बच्चों का सबसे पहला जीवन स्रोत उनकी मां का दूध होता है और स्पर्श अनुभूति के रूप में मां के स्तन और स्तनपान मानव का पहला प्रेम नैसर्गिक रूप से बन जाता है पहला आकर्षण भी यही बनता है और इस आकर्षण के अनुभूति को राजकपूर जी ने हमेशा अपनी फिल्मों के फिल्मांकित किया है। ’’मातृत्व सृजन उभार अंग’’ के प्रति आकर्षण जीव की प्राकृतिक स्थिति को प्रदर्शित करती है इसके बाद आपके फिल्मों का मध्यकाल मानव की अच्छाई, बुराई, कमजोरी, ताकत, लौकिक क्रियाकलाप आदि का प्रदर्शन रहता है। इस लौकिक पक्ष के बाद जो सार्वभौमिक सत्य है वह निर्वाण का है और उसको पाने की ललक, कसक आपने अपनी सभी फिल्मों के फिल्मांकित करने का कार्य किया है राजकपूर जी का खुद का जीवन भी इन्हीं तीनों स्तरों के खोज की कहानी है। आपने इन तीनों स्तरों को सहज भाव से जीकर देखा भी है, ’’मेरा नाम जोकर’’ इस खोज की जीवंत कहानी है जिसे आपने फिल्मी पर्दे पर सजीव करने का प्रयत्न किया है फिल्म भी पर्दे पर जैसे-जैसे जवान होती है और आगे बढ़ती है वैसे-वैसे ही सम्पूर्ण मानवता को पाठ पढ़ाती हुई अपनी प्रासंगिकता प्रतिपादित तथा चिरस्थायी करती जाती है। अपने फिल्मी सृजनशीलता में माँ, मानव, महानिर्वाण को खोजते इस अन्वेषी महान फिल्मकार अभिनेता को आज हम प्रेम पूर्ण श्रंद्धाजली अर्पित करते हैं।

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आलेख – अजय नारायण त्रिपाठी

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अविस्मरणीय गौरवमयी पल व्हाइट टाइगर सफारी लोकार्पण

मारने वाले से बचाने वाला बडा होता है बचाने वाले से पालने वाला और जो लाए, बचाए, पाले उसकी बडाई का कहना ही क्या। सन 1976 में रीवा से सफेद बाघ का नाता टूट गया था अंतिम बाघ विराट के न रहने पर पूरा विन्ध्य केवल सफेद बाघ की कहानी गायक बन कर रह गया। राजेन्द्र शुक्ल की तब उम्र केवल 12 वर्ष की थी ऐसा बालमन जो कौतूहलो से भरा रहता है जो खेलना चाहता है, घूमना चाहता है, प्रकृति को आष्चर्य भरी निगाहों से निहारता है और फिर सवाल उठाता है बारिस क्यो होती है? इसका पानी कहां जाता है? बीज से पेड़ कैसे बनते है? जंगल क्यो है? जीव जन्तु क्यो जरूरी है? इन्द्रधनुष कैसे बनता है? पेड़ हरे क्यो हैं? इन सब सवालो के जबाव स्कूलो में मिलने की उम्र भी यह है। इस अवस्था में प्रकृति प्रेमी इस बच्चे ने यह जाना की हमारा क्षेत्र जो सफेद बाघ के गौरव से परिपूर्ण था अब वह विहीन हो चुका है। हम अब कभी सफेद बाघ इस क्षेत्र में नही देख पायेगें सफेद बाघ कैसा होता है अब यह केवल चित्रों के माध्यम से दूसरो को बता पायेंगे या फिर अन्य जगहांे पर जा कर देख पायेगें जहां पर यहीं के सफेद बाघ भेज दिए गए हैं। .. आगे पढ़ें


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